मौत का पहाड़

हिमालय की तरफ़ में एक गाँव था, लंगसा। उसके पीछे खड़ा था एक पहाड़, जिसके बारे में कोई भी गाँव वाला दिन में बात नहीं करता था।

कहते थे, जो उस पहाड़ पर गया, वो कभी वापस नहीं आया।

गाँव के बुजुर्ग कहते थे, वहाँ ऊपर कोई मंदिर नहीं है, कोई खज़ाना नहीं है। वहाँ सिर्फ़ पत्थरों के बीच एक गुफा है, जहाँ हवा भी चलना भूल जाती है। और उस गुफा के अंदर, अपनी ही परछाईं दिखती है।

यानी, मौत दिखती है।

एक साल अकाल पड़ा। गाँव में अनाज खत्म हो गया। एक लड़का था, मेघ। उसने सोचा, अगर मैं पहाड़ पार करके दूसरी तरफ़ पहुँच जाऊँ, तो शायद कोई नदी, कोई खेत मिल जाए।

गाँव वालों ने उसे रोका, मगर वो सुबह उठकर अकेला ही पहाड़ पर चढ़ गया।

दो दिन की चढ़ाई के बाद वह गुफा के सामने पहुँचा। गुफा के अंदर से कोई आवाज़ नहीं आ रही थी, फिर भी उसके कान में एक घूंट जैसी धड़कन गूँज रही थी।

वह अंदर गया।

गुफा अंधेरी थी, लेकिन सामने एक चट्टान पर एक आदमी बैठा था। बिल्कुल उसी की तरह, उसी के कपड़ों में, उसी के चेहरे वाला।

"तुम कौन हो?" मेघ ने पूछा।

उसने हंसकर कहा, "मैं तुम हूँ।"

मेघ डर से भागने लगा, तो उसने कहा, "रुको। अगर तुम भागे, तो तुम मरे।"

मेघ रुक गया।

उसने कहा, "यह पहाड़ किसी को नहीं मारता। लोग अपनी ही हार, अपनी ही उम्मीद खोकर मरते हैं। इस गुफा में सिर्फ़ वही दिखता है, जो तुम हो। अगर तुममें डर है, तो तुम डरकर मर जाओगे। अगर तुममें हिम्मत है, तो तुम जीते हुए निकल जाओगे।"

मेघ ने अपनी आँखें बंद कीं। उसने अपने माँ के चेहरे को याद किया, अपने गाँव के खेतों को याद किया, और जोर से कहा, "मैं मरने नहीं आया हूँ, मैं जीने का रास्ता खोजने आया हूँ।"

जब उसने आँखें खोलीं, तो गुफा के सामने वाला आदमी गायब हो गया। और गुफा के दूसरी ओर से हल्की रोशनी आ रही थी।

वह रोशनी से बाहर निकला, तो पहाड़ के पार एक हरी घाटी थी, जहाँ नदी बह रही थी और धान के खेत थे।

वो वापस आया, और गाँव को वह रास्ता दिखाया।

उस दिन से गाँव वाले पहाड़ को मौत का पहाड़ नहीं, जिंदगी का पहाड़ कहने लगे।