सीखने का सफ़र
हर सुबह स्कूल की घंटी बजती और बच्चे अपनी-अपनी कक्षा की ओर दौड़ पड़ते। किसी के हाथ में किताब होती, किसी के हाथ में टिफिन और किसी के चेहरे पर नींद अभी भी बाकी होती।
कक्षा 8 में पढ़ने वाला आरव भी उन्हीं बच्चों में से एक था। उसे स्कूल जाना अच्छा लगता था, लेकिन पढ़ाई में उसका मन हमेशा नहीं लगता था। खासकर गणित का नाम सुनते ही उसका दिमाग कहता—“आज कुछ और कर लेते हैं!” 😄
एक दिन गणित की कक्षा में शिक्षक ने बोर्ड पर एक सवाल लिखा।
“कौन हल करेगा?”
पूरी कक्षा अचानक शांत हो गई।
आरव ने मन ही मन सोचा, “आज तो नजरें नीचे ही रखना बेहतर है।”
लेकिन शिक्षक ने मुस्कुराते हुए कहा, “आरव, तुम आकर इसे हल करो।”
आरव धीरे-धीरे बोर्ड के पास गया। उसने सवाल देखा और कुछ देर सोचता रहा। फिर उसने उत्तर लिखा।
उत्तर गलत था।
कुछ बच्चे हँसने लगे।
आरव को बहुत बुरा लगा। वह चुपचाप अपनी सीट पर वापस आ गया।
शिक्षक ने कहा, “गलत उत्तर देने में शर्म की कोई बात नहीं है। असली गलती तब होती है, जब हम गलती से सीखना बंद कर देते हैं।”
ये बात आरव के मन में बैठ गई।
उस दिन घर जाकर उसने वही सवाल दोबारा हल किया। फिर तीसरी बार किया। इस बार भी गलती हुई। उसने अपनी गलती ढूँढ़ी और फिर से कोशिश की।
अगली सुबह वह शिक्षक के पास गया और बोला, “सर, अब मुझे समझ आ गया कि मेरी गलती कहाँ हुई थी।”
शिक्षक मुस्कुराए।
धीरे-धीरे आरव की आदत बदलने लगी। अब वह कठिन सवाल देखकर भागता नहीं था। विज्ञान में कोई प्रयोग समझ न आए तो सवाल पूछता। इतिहास में कोई घटना समझ न आए तो उसके बारे में पढ़ता। और जब कोई दोस्त किसी विषय में कमजोर होता, तो वह उसे समझाने की कोशिश करता।
कुछ महीनों बाद स्कूल में एक विज्ञान प्रदर्शनी हुई। आरव और उसके दोस्तों ने मिलकर एक छोटा-सा मॉडल बनाया। मॉडल बहुत बड़ा या महँगा नहीं था, लेकिन उसे बनाने में उन्होंने कई बार गलती की थी।
प्रदर्शनी के दिन उनका मॉडल देखकर शिक्षक ने कहा,
“तुम लोगों ने सिर्फ एक मॉडल नहीं बनाया है। तुमने कोशिश करना सीखा है।”
आरव मुस्कुराया।
उसे उस दिन समझ आया कि सीखना सिर्फ किताबों के पन्नों तक सीमित नहीं है।
कभी एक गलत उत्तर हमें सिखाता है।
कभी एक शिक्षक हमें सही दिशा दिखाता है।
कभी दोस्त हमारी मदद करते हैं।
और कभी हमारी अपनी गलतियाँ हमारी सबसे अच्छी शिक्षक बन जाती हैं।
आरव का सफ़र अभी खत्म नहीं हुआ था। असल में, उसका सफ़र तो अब शुरू हुआ था।
क्योंकि सीखने की कोई अंतिम मंज़िल नहीं होती—हर नया सवाल एक नई शुरुआत होता है।
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